महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज – 18

 


दिवस पर दिवस बीतते गए किन्तु, शांतनु तो दुबारा दासराज की  कुटिया पर आये ही सत्यवती को दुबारा उनके दर्शन हुए

सत्यवती रोज की भांति आज भी यमुनातट पर अपनी नौका में बैठी निरुद्देश्य शून्य की ओर अपनी दृष्टि टिकाये थी

उसका मन कई प्रश्नों में उलझा था

क्या उसके पिता ने शांतनु को वचन में बाँधने की चेष्टा कर अनुचित कर्म किया था ?

क्या अब शांतनु पुनः वापस नहीं लौटनेवाले ?

दिनों-दिन समय का बीतता चला जाना शायद इसी सत्य को बतला रहा था

अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के हठ में उसके पिता ने शांतनु के साथ अन्याय नहीं कर डाला ?

क्या किसी से अनुचित वचन की आकांक्षा करना पाप नहीं ?

शायद वह राजा शांतनु से उनकी कोई भी प्रिय वस्तु माँगते तो वो हँसकर दे देते किन्तु पुत्र के अधिकारहरण के लिए विवश करनायह अनुचित ही तो है

कोई भी सम्माननीय व्यक्ति अपना सर्वस्व तो  न्यौछावर कर सकता है किन्तु किसी अन्य को विवश नहीं कर सकता आखिर किस मुख से शांतनु अपने पुत्र को अपना अधिकार छोड़ने को कहेंगे ?

निश्चय ही उसके पिता ने अनुचित आग्रह किया था

सत्यवती इन्ही विचारों में खोयी थी। उसकी आँखों से अश्रु की बूँदे ढलक उठीं अश्रुयुक्त नेत्र से आकाश धुँधला दिखने लगा सत्यवती ने अपने उत्तरीय के किनारे से अपने अश्रु पोछे

आह ! कितना प्रेम भरा था शांतनु के शब्दों में

श्याम वर्ण तो स्वयं में ही संपूर्ण वर्णों को समाहित रखता है जिसमें सबकुछ समाहित हो उससे सुंदर तो कुछ हो ही नहीं सकता

आज विरह का वह दंश सत्यवती के हृदय को भी व्यथित कर रहा था जिस दंश को शांतनु लगातार झेल रहे थे

आज विरह की असह्य वेदना ने सत्यवती के हृदय के बाँध को ध्वस्त कर डाला था उसके नेत्रों से झरझर आँसू बहने लगे लज्जावश उसने उत्तरीय से अपने मुख को ढँक लिया कहीं कोई उसे यूँ ही तट पर रोता  देख ले

क्रमशः ....

लेखक – राजू रंजन  

टिप्पणियाँ