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    महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज – 17

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    दीपक के मद्धिम प्रकाश में राजा शांतनु शयनकक्ष में लेटे  हुए थे । निकट ही बैठे देवव्रत अपने पिता के चरण दबा रहे थे । शांतनु अत्यंत व्यथित मन के साथ लेटे थे । अन्य दिनों की भाँति आज वे अपने पुत्र से वार्तालाप नहीं कर रहे थे । देवव्रत को उनका यह व्यवहार थोड़ा असहज लगा । देवव्रत ने शयनकक्ष में विद्यमान मौन को अपने शब्दों से तोड़ा –
    “ पिताश्री ! क्या बात है ? आज आप कुछ भी नहीं बोल रहे । कहीं मुझसे कोई अपराध तो नहीं हुआ ?”
    देवव्रत के शब्दों ने शांतनु की विचार – श्रृंखला को भंग कर दिया ।
    “ नहीं पुत्र ! तुम्हारे जैसे पुत्र से कोई अपराध तो कभी हो ही नहीं सकता । गंधर्वराज को युद्ध में पराजित कर तुमने हस्तिनापुर का मान और भी बढ़ा दिया है । मैं तो ऐसे पुत्र को पाकर धन्य हूँ । “
    “ तो फिर आप इतने चिंतित क्यों दिख रहे हैं पिताश्री ?
    “ मैं हस्तिनापुर के भविष्य के लिए चिंतित हूँ । शास्त्रों में एक पुत्र को पुत्र न होने के समान ही माना गया है । यह और बात है कि तुम्हारे जैसा एक पुत्र होना भी सौ पुत्रों से बढ़कर है । कहना नहीं चाहिए पुत्र ! किन्तु , कहीं युद्ध में सर्वदा रत रहनेवाला मेरा पुत्र वीरगति को प्राप्त हो गया तो हस्तिनापुर के सिंहासन का क्या होगा ? गंधर्वराज को तुमने पराजित तो कर दिया । किन्तु , अगर तुम भूलवश भी उसकी मायावी नगरी में प्रवेश कर जाते तो मैं पुत्रहीन हो जाता । इस कल्पना - मात्र से ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं । मेरे मस्तिष्क की नसें फटने लगती हैं । “
    इतना कहकर शांतनु अपनी हथेलियों को अपने ललाट पर फेरने लगे ।
    “ पिताश्री ! आपकी चिंता मात्र आपके अतिशय पुत्र – प्रेम का परिणाम है । क्षत्रिय का जन्म ही अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देने के लिए होता है । अब मुझे यह प्रतीत होता है कि व्यर्थ ही मैंने गंधर्वराज की उस मायावी नगरी में प्रवेश नहीं किया । मुझे उसमें प्रवेश कर इस मिथक को तोड़ना चाहिए था कि उस नगरी से कोई जीवित नहीं लौटता । क्षत्रिय कभी मृत्यु का शोक नहीं मनाते । रणभूमि में प्राप्त होनेवाली मृत्यु तो क्षत्रिय का गौरव है । राज्य की चिंता करना राजा का कर्तव्य होता है । किन्तु , पिताश्री ! क्षमा चाहता हूँ । हस्तिनापुर का अस्तित्व आपके एवं मेरे इस पृथ्वी पर आने से पूर्व भी था एवं आगे भी हस्तिनापुर विद्यमान रहेगा । मनुष्य को मात्र समयानुकूल कर्म करना चाहिए । परिणाम की चिंता उस विधाता पर ही छोड़ देना चाहिए जिसने इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड को रचा है । “
    देवव्रत का मुख अलौकिक तेज से दीप्त हो उठा । यह तेज क्षत्रियत्व का था , यह तेज अभय का था । उस तेज से दमकता देवव्रत का व्यक्तित्व शांतनु को अत्यंत विशाल दीख पड़ा । शांतनु ने उस महाकाय व्यक्तित्व के समक्ष स्वयं को अत्यंत क्षुद्र पाया ।
    कितना बड़ा अपराध है ऐसे पुत्र के अधिकारों के हरण का विचार भी मन में लाना ! ऐसे तेजस्वी को सिंहासन न सौंपना हस्तिनापुर के साथ कितना बड़ा अन्याय होगा ।
    पहली बार शांतनु को अपने उस कर्म पर गर्व की अनुभूति हुई जो उन्होंने दासराज के समक्ष किया था । धीरे – धीरे चंद्रमा आकाश में चढ़ता गया । रात्रि प्रकाशमान तो प्रतीत हो रही थी । किन्तु , आमावस्या की गहन कालिमा अब अधिक दूर नहीं थी ।
    * *
    प्रातः काल का सूर्य अपने साथ किसी मादक सुगंध को लेकर आया था । शांतनु का मन फिर से न जाने क्यों यमुना तट की ओर खिंचने लगा । उनकी बुद्धि को मानों किसी ने हर लिया हो । बिना किसी को बताए शांतनु ने रथ पर सवार होकर सारथि को यमुना तट की ओर चलने का संकेत किया । जिस प्रकार कीट  - पतंग अपनी मृत्यु की चिंता छोड़कर दीपक के प्रकाश का आलिंगन कर लेते हैं । वैसे ही हित – अनहित का विचार किए बिना ही शांतनु पुनः यमुना तट की ओर चल पड़े । तट से थोड़ी दूर वृक्षों के झुरमुट के पास जाकर शांतनु ने सारथि को रुकने का संकेत दिया । शांतनु रथ से उतरकर एक वृक्ष की आड़ लेकर यमुना तट की ओर देखने लगे । वृक्षों की पंक्तियाँ कुछ इस भाँति सजी थी कि वहाँ से यमुना तट की ओर देखा जा सकता था । किन्तु, यमुना तट से वृक्षों के पार देखा जाना संभव न था । शांतनु के नेत्र तट पर जिसे खोज रहे थे वह शीघ्र ही प्रकट हुई । सत्यवती नौका के एक कोने में बैठी यात्रियों की प्रतीक्षा कर रही थी । शांतनु को अपने कानों में सत्यवती की वह ध्वनि गूँजती सी प्रतीत हुई ।
    “ मेरा नाम सत्यवती है । दोपहर के समय पिताश्री विश्राम करते हैं । उस समय मैं नौका चलाने का कार्य करती हूँ । “
    शांतनु की चेतना सजग हो उठी ।
    किन्तु , यह दोपहर तो नहीं है । प्रातः कल ही सत्यवती तट पर उपस्थित है । कहीं वह भी उनकी ही भाँति वियोग की पीड़ा के वशीभूत होकर तो नहीं आई ?
    शांतनु के मन में ज्वार उठा । इच्छा हुई अभी दौड़कर सत्यवती के समक्ष उपस्थित हो जाएँ एवं समस्त वर्जनाओं को ध्वस्त कर उसे हस्तिनापुर ले जाएँ । किन्तु , दासराज के उस उपालंभ की स्मृति मस्तिष्क में जाग उठी ।
    “ चाहे तो आप बलात मेरी कन्या का हरण कर सकते हैं क्योंकि आप शक्तिशाली हैं । किन्तु , वह बलात ही होगा मेरी सहमति से कदापि नहीं । “
    दासराज के कहे गए एक – एक शब्द मानों सम्पूर्ण शरीर में असंख्य काँटों की भाँति चुभ रहे हों । किन्तु , सत्यवती का मुख मानों उनके हृदय पर चन्दन के लेप की भाँति शीतलता प्रदान कर रहा था ।
    हाँ ! ठीक है दासराज ! मैं तुम्हारी कन्या से विवाह नहीं कर सकता । न ही मैं अपने पुत्र के अधिकारों का हरण कर सकता हूँ । किन्तु , कोई भी वचन मुझे सत्यवती के मुख के दर्शन से रोक नहीं सकता । मेरा मन बस उसे देखकर ही तृप्त हो उठेगा । शांतनु खड़े – खड़े वृक्ष की ओट से सत्यवती को निहारते रहे ।
    अचानक शांतनु को प्रतीत हुआ मानों सत्यवती भी उन्हें देख रही हो । मानों सत्यवती की दृष्टि वृक्षों को चीरकर उनके पास पहुँच रही हो । शांतनु ने सहमकर स्वयं को वृक्ष की ओट में पूरी तरह से छुपा लिया । जैसे उनकी चोरी पकड़ी गयी हो । किन्तु , उनके मस्तिष्क ने उन्हे समझाया कि तट से इन वृक्षों के पार देखा ही नहीं जा सकता । तो फिर उस दृष्टि में ऐसी तीव्रता क्यों थी ?
    शायद एक प्रेमपूर्ण हृदय दूसरे हृदय को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था ।
    मन को समझाकर पुनः शांतनु तट की ओर देखने लगे । इतने में एक यात्री आता दिखा । उसने सत्यवती से कुछ कहा और नौका में बैठ गया । सत्यवती नौका को लेकर चल पड़ी । जैसे – जैसे नौका नदी – तट से दूर होने लगी शांतनु की व्यग्रता बढ़ने लगी । अब सत्यवती का मुख नहीं दिख पा रहा था ।
    आह ! तुम्हारी उपस्थिति की कल्पना मात्र भी कितना सुख प्रदान करती है !
    शांतनु की दृष्टि यमुना की ओर टिकी थी । कब सत्यवती पुनः तट पर वापस आए । एक – एक क्षण मानों वर्ष की भाँति लगने  लगे ।
    वियोग की पीड़ा में कष्ट भी होता है और एक आनंद भी । धीरे – धीरे उस पीड़ा का व्यसन लग जाता है । फिर उस मिलन – विरह के क्रम के समक्ष समस्त सृष्टि का लोप हो जाता है । मात्र वह पीड़ा ही शाश्वत रह जाती है ।
    दूर यमुना की लहरों के मध्य दोलायमान होती सत्यवती की नौका तट की ओर लौटती दिखी । शांतनु के मुख पर हर्ष की एक लहर दौड़ पड़ी । जैसे – जैसे नौका पास आती गयी शांतनु के मन का उजास बढ़ता गया । और वह उजास धीरे – धीरे बाह्य प्रकृति पर भी छा गया । सबकुछ दीप्त हो उठा ।
    सत्यवती ने नौका को तट पर लाकर रोका । फिर उसे एक रज्जु से बाँध दिया ताकि वह यमुना की लहरों में भी स्थिर रहे । तत्पश्चात वह उसी ओर चल पड़ी जिस ओर शांतनु थे । शांतनु के हृदय का स्वर तीव्र हो उठा ।
    क्या उनकी चोरी पकड़ी गयी ?
    जैसे – जैसे सत्यवती निकट आती जा रही थी शांतनु की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी । सत्यवती की मादक सुगंध उसे स्पर्श करती वायु के साथ चलकर शांतनु की नासिका तक पहुँचने लगी । मन और मस्तिष्क दोनों ही जड़ से हो गए । शांतनु बस निर्निमेष देखते रहे । किन्तु , सत्यवती उन वृक्षों से लगे पथ पर आगे बढ़ गयी । शांतनु के हृदय को शांति मिली । सत्यवती ने उन्हे नहीं देखा था । शांतनु की दृष्टि पथ पर तबतक टिकी रही जबतक सत्यवती उनकी दृष्टि से ओझल नहीं हो गयी । सत्यवती के सामीप्य की अनुभूति से उनका रोम – रोम चेतन हो उठा ।
    शांतनु वहीं वृक्ष की छाया में बैठ गए । अभी सूर्य के आकाश के मध्य में पहुँचने में थोड़ा विलंब था । शांतनु सत्यवती के विचारों में लीन ही थे कि सारथि के स्वर उनके कानों में पड़े –
    “ महाराज ! आपने प्रातः काल से जलपान भी नहीं किया । मैं पास से ही आपके लिए फल , मिष्टान्न एवं शीतल जल लाया हूँ । कृपया ग्रहण करें । “
    सारथि का कथन सत्य था । सत्यवती को देखते – देखते न तो शांतनु को भूख का ध्यान रहा न ही प्यास का । अब उन्हें आभास हुआ कि उनका कंठ सूख रहा है । सर्वप्रथम शांतनु ने इच्छा भर जल का पान किया तत्पश्चात थोड़ा रुककर आहार ग्रहण किया । इसके मध्य वे बार – बार तट की ओर भी देख रहे थे । आहार ग्रहण कर शांतनु ने अत्यंत स्नेह के साथ सारथि से कहा –
    “ जब युद्धभूमि में होता हूँ तो तुम पर रथ की चिंता छोडकर सिर्फ युद्ध करता हूँ । और जब इस जीवन  की कर्मभूमि में होता हूँ तब प्राणों की चिंता तुम्हारे हाथों में सौंप देता हूँ । तुम्हारे साथ होते मुझे किसी बात की चिंता नहीं होती । “
    “ यह तो मेरा कर्तव्य है महाराज ! इससे अधिक कुछ भी नहीं । शेष तो मात्र आपका प्रेम है । “
    शांतनु कुछ कहना ही चाहते थे कि उनकी नासिका ने उस चिरपरिचित सुगंध को पहचान लिया ।
    हाँ ! सत्यवती आ रही थी ।
    शांतनु सचेत हो गए । सत्यवती उनके निकट से ही पथ पर चलती हुई यमुना तट पर पहुँची ।
    शांतनु जाती हुई सत्यवती को पीछे से देखते रहे । सत्यवती के निकट से प्रवाहित होती हुई वायु , उसके शरीर का हर स्पंदन और शायद उसके मन का स्पंदन भी शांतनु पहचानने लगे थे । यमुनातट का कण – कण प्रेममय हो चुका था । इस प्रेम में सामीप्य था साथ ही वियोग भी , आनंद था साथ ही पीड़ा भी , यह व्यक्त था साथ ही अवयक्त भी ।
    शांतनु पराजित थे अथवा विजयी – इसका निश्चय अत्यंत दुष्कर था । अपने कर्तव्य को आगे रखकर उन्होने दासराज के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था । किन्तु , अपने हृदय से विवश होकर वह प्रतिदिन प्रातः काल से सायं काल तक यमुना तट पर अपना समय व्यतीत कर रहे थे ।  
    क्रमशः ....
    लेखक – राजू रंजन 

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