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    महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज - 11



    नौका के एक कोने में एक युवती बैठी थी । राजा शांतनु उस ओर बढे । पुष्पों की सुगंध उसी दिशा से आ रही थी । शांतनु ने उस नौका के पास पहुंचकर उस युवती से प्रश्न किया -
    " हे देवी ! क्या आपकी नौका में कमल के पुष्प है ? "
    युवती चौंकी । पुनः सहज होते हुए कहा -
    " नहीं ! मेरी नौका में पुष्प नहीं हैं । " युवती के मुख पर बरबस एक हल्की मुस्कान तैर उठी ।
    " किन्तु, आपकी नौका से कमल के पुष्पों की सुगंध आ रही है । "
    " आप सुगंध की खोज में हैं या फिर कमल की ? " युवती के नेत्र चंचल हो उठे ।
    शांतनु भी मुस्कुराये बिना न रह सके ।
    " कमल को खोज लूँगा तो सुगंध का पता तो स्वयं चल जायेगा । "
    " हो सकता है कमल की खोज में मैं आपकी सहायता कर सकूँ । आप यमुना में नौका - विहार क्यों नहीं करते । पुष्प यमुना में ही तो होंगे । कमल जल में ही होते हैं । तट पर तो मिलेंगे नहीं । "
    युवती के शब्दों में आकर्षण था और शांतनु खिंचते चले जा रहे थे ।
    " कौन कराएगा मुझे नौका - विहार ? "
    " मैं कराऊंगी ।  "
    " आप ! आप तो एक स्त्री हैं । यह तो मल्लाहों का कार्य है । "
    क्यों ? स्त्री को सीमाओं में बाँधना चाहते हैं आप ? मैं तो मुक्त हूँ । मैं आपको यमुना - विहार करा सकती हूँ और सीमाओं से मुक्त भी करा सकती हूँ । "
    युवती हँस पड़ी । यमुना की दोलायमान जल - तरंगे उस हँसी से तादात्म्य कर रही थीं ।
    " तो फिर मुक्त करो मुझे । स्त्री सीमातीत है । मैं भी उस कमल को पाना चाहता हूँ जिसकी सुगंध से संपूर्ण यमुना - तट सुवासित हो रहा है । चलो ढूंढते हैं यमुना में उसे ! "
    शांतनु ने अपने पग नौका में रख दिए । नौका थोड़ी हिली फिर शांतनु के एक जगह खड़े होते ही स्थिर हो गयी ।
    " किन्तु , नौका - विहार का मूल्य भी चुकाना होगा आपको । चलने से पहले आपको जान लेना चाहिए । "
    " जो मूल्य होगा मैं चुकाऊँगा । अब चलो । उस कमल - दल को ढूंढ निकालो । " शांतनु की दृष्टि अपलक उस युवती पर टिकी थी । युवती ने लज्जावश अपनी आँखें नीचे कर लीं एवं पतवार को चलाना प्रारंभ किया ।
    ' शांतनु की दृष्टि अब भी उसी पर थीं । युवती जलराशि की ओर देखती हुई बोली -
    " अगर कमल ढूँढने हों तो आपको जल में देखना होगा । नौका में कमल नहीं खिलते । "
    इन शब्दों से शांतनु को अपनी स्थिति का बोध हुआ । उन्होंने अपनी आँखों को यमुना की प्रवाहित होती जलराशि की ओर किया ।
    " क्षमा चाहता हूँ । "
    राजा ने कहा ।
    दोनों यमुना की लहरों के साथ नौका में आगे बढ़ते गए । शांतनु कभी जल को देखते तो कभी चोरों की भाँति चुपके से उस युवती की ओर देखकर अपनी आँखें दूसरी ओर फेर लेते । काफी समय के उपरान्त भी कोई कमल - पुष्प नहीं दिखा । युवती ने कहा -
    " कोई कमल दिखा क्या ?"
    " नहीं ! जल में तो नहीं । वैसे आपका परिचय क्या है ? "
    " मेरा नाम सत्यवती है । दोप्पहर के समय पिताश्री विश्राम करते हैं । उस समय मैं नौका चलाने का कार्य करती हूँ । "
    " सत्यवती ! अत्यंत शुभ नाम है । तो फिर सत्य बताओ न ! कमल के पुष्प तो दिख नहीं रहे । फिर यह सुगंध किधर से आ रही है । और यह सुगंध तो इसी नौका से आती प्रतीत हो रही है । "
    " मैंने तो प्रारंभ में ही पूछा था कि आपको कमल की खोज करनी है या फिर कमल के सुगंध की । आपने उत्तर दिया थे - कमल की । अतः आपके साथ - साथ मैं भी कमल की खोज कर रही हूँ ।"
    " कमल एवं कमल की सुगंध की खोज में क्या अंतर है ? सुगंध कमल से ही तो आएगी । कमल का पता चलने पर सुगंध का पता तो स्वयं ही चल जायेगा । "
    " नहीं ! दोनों में अंतर है । कभी - कभी सुगंध पुष्प के बिना भी आ सकती है । " इतना कहकर अधरों पर मुस्कान लिए सत्यवती शांतनु की ओर देखने लगी ।
    " आश्चर्यजनक ! पुष्प के बिना सुगंध ! तो फिर उस सुगंध का रहस्य ही समझा दीजिये जो बिना पुष्पों के आ रही है । "
    शांतनु के स्वर में जिज्ञासा थी । सत्यवती के कपोल लज्जा से रक्तिम हो उठे । उसने यमुना की लहरों पर अपनी दृष्टि टिकाते हुए कहा -
    " यह सुगंध मुझसे आ रही है । कमल के पुष्पों की सुगंध का स्रोत मैं ही हूँ । "
    "सुगंध का स्रोत आप हैं ! " शांतनु सत्यवती की ओर थोडा चलकर और निकट पहुंचे । अपनी नासिका से वायु को पूरा खींचा । सत्य कह रही थी सत्यवती ! सुगंध उसके शरीर से ही आ रही थी ।
    " सत्य कहा । किन्तु ऐसा कैसे हो सकता है ? मानव शरीर से पुष्पों की सुगंध ! "
    शांतनु ने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि सत्यवती पर टिका दी ।
    " हाँ ! यह हो सकता है । महर्षि पाराशर ने अपनी सेवा से संतुष्ट होकर मुझे वर दिया था । कमल के पुष्पों की सुगंध का ! पहले मेरे शरीर से मत्स्य की दुर्गन्ध आती थी । मैं मत्स्यगंधा थी । महर्षि ने मुझे पंकजगंधा  बना दिया । "
    शांतनु की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं । पंकजगंधा ! कितना सुन्दर उपनाम है ।
    सहसा सत्यवती ने अपनी आँखें नदी - तट की ओर फेरी ।
    " पिताश्री तट पर आ चुके हैं । अब आपको अपने कमल की खोज को यहीं विश्राम देना होगा । मुझे नौका तट की ओर ले जानी होगी । "
    सत्यवती पतवार को चलाती नौका को तट की ओर ले जाने लगी ।
    शांतनु ने अपने गले में पड़ी मुक्ता - माला को निकालकर युवती की ओर बढाया ।
    " लो ! नौका - विहार का मूल्य । "
    सत्यवती मुक्ता - माला को देखकर थोड़ी झिझकी ।
    " किन्तु , यह तो नौका - विहार के मूल्य से कई गुना अधिक है । "
    " अधिक नहीं है सत्यवती ! सुगंध का कोई मूल्य नहीं होता । नौका - विहार के साथ - साथ पंकजगंधा की सुगंध भी तो मेरे साथ थी । "
    शांतनु ने मुक्ता - माला सत्यवती के अंक में डाल दिए । नौका तट पर आ लगी । शांतनु मुस्कुराते हुए उस नौका से उतरे । उस युवती के पिता  शांतनु को देखकर चौंक पड़े । उनके कंठ से मुश्किल से स्वर फूटा । हाथ जोड़ते हुए बोले -
    " महाराज शांतनु ! मैं धन्य हो गया । आपने मेरी नौका से यमुना - विहार किया । मेरी नौका पवित्र हो गयी॥ "
    महाराज शांतनु ! - यह शब्द सत्यवती के कानों में गूंज उठा । अर्थात हस्तिनापुर के महाराज इतनी देर तक मेरी नौका से विहार करते रहे । सत्यवती के संपूर्ण शरीर में गुदगुदी - सी होने लगी । "
    क्रमशः ...................
    लेखक - राजू रंजन

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