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    महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज -6

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    " मृत्यु ! यह शब्द कितना भयावह लगता है । किन्तु, यह मात्र आपकी सहज मानवी दृष्टि का भ्रम है । मृत्यु के पार क्या है ? इसका बोध इस मानव शरीर को नहीं होता । इसलिए मृत्यु को आप दुःख का कारण समझ रहे हैं । किन्तु , मृत्यु कभी - कभी मुक्ति का साधन भी हो सकती है । सांसारिक दुखों से मुक्ति का साधन ! "
    - गंगा ने शांत स्वर में कहा ।
    " मैं इतना ज्ञानी  नहीं एवं न ही मृत्यु के पार मुझे कुछ दिखता है गंगे ! मुझे तो मात्र अपने सात पुत्रों की मृत्यु का कारण चाहिए । माता का स्थान सदा से सर्वोच्च रहा है । किन्तु एक माता पुत्रघातिनी कैसे हो सकती है ? उन पुत्रों की मृत्यु के शोक का लेशमात्र चिह्न भी नहीं है आपके मुख पर । गंगे ! मुझे भ्रमित न कीजिये । मुझे मात्र उत्तर चाहिए । आपने मेरे पुत्रों की हत्या क्यों की ? "
     शान्तु का स्वर क्रोध एवं संताप से काँप रहा था ।
    " राजन ! जिन्हें आप अपना पुत्र समझ रहे हैं । वे मात्र आपके पुत्र नहीं हैं । इस पृथ्वीलोक से परे भी उनका अस्तित्व है । आपके आठों पुत्र वसुगण हैं । देवलोक के वसुओं ने शापग्रस्त होकर आपके पुत्र के रूप में जन्म लिया था । इन आठ वसुओं ने महर्षि वशिष्ठ के गौ को चुराने का अपराध किया था । अतः महर्षि वशिष्ठ ने इन्हें शाप दिया कि इनका पृथ्वी पर मानव के रूप में जन्म होगा । किन्तु , इनके क्षमायाचना करने पर महर्षि वशिष्ठ ने सात वसुओं की शाप की मात्र को घटा दिया एवं उन्हें जन्म के कुछ समय उपरान्त ही मानव देह से मुक्त होने की छूट दे दी । किन्तु, यह आपका आठवाँ पुत्र वसु ध्यौ है । चूँकि इनकी प्रेरणा से ही अन्य वसुओं ने चोरी का कार्य किया । अतः इन्हें महर्षि वशिष्ठ ने क्षमा नहीं किया । इन्हें दीर्घ काल तक इस पृथ्वी पर अपना जीवन बिताना होगा । वसुओं ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं उनकी माता बनूँ  एवं उनके जन्म लेने के उपरान्त उन्हें नदी में प्रवाहित कर दूं ताकि उन्हें शाप से मुक्ति मिले । मैंने किसी की हत्या नहीं की है राजन ! अपितु , सातों वसुओं को मानव शरीर के दुखों से मुक्ति प्रदान की है । उन्हें शापमुक्त किया है । राजन ! आपका यह आठवाँ पुत्र दीर्घकाल तक इस पृथ्वी पर अपना जीवन व्यतीत करेगा । यह पुत्र आपके यश को बढ़ानेवाला होगा । "
    गंगा के वचन सुनकर मानों शांतनु को उस सत्य का ज्ञान हुआ जो आजतक उनकी मानवी बुद्धि से परे था । वह स्वयं महाभिष हैं , उनकी पत्नी देवनदी गंगा है , उनके पुत्र वसु हैं । यह आठवाँ पुत्र यशस्वी होगा । उनका संताप कुछ कम हुआ ।
    " राजन ! यह आठवाँ पुत्र देवव्रत के नाम से प्रसिद्ध होगा । किन्तु , आपने अपने वचन का पालन नहीं किया है । अतः हमारा साथ यहीं तक था । मुझे आपसे आज्ञा लेनी होगी । सन्तान का पालन माता ही भली - भाँति से कर सकती है । अतः यह पुत्र मैं ले जा रही हूँ । इसका उचित प्रकार से पालन - पोषण कर निश्चित समय पर पुनः आपको सौंप दूँगी । मुझे अभी मात्- सुख का आनंद लेने दें । कालांतर में आपको पितृ - सुख अवश्य प्राप्त होगा । मैं आज्ञा चाहती हूँ । "
    गंगा ने अश्रुयुक्त नेत्रों से शांतनु से विदा ली । शांतनु मूर्तिवत स्थिर थे । जिस गंगा से उन्होंने इतना प्रेम किया , उसपर उन्होंने पुत्रघतिनी होने का आरोप लगाया । क्या उनके प्रेम में विश्वास की कमी थी ? या फिर एक पिता होने के नाते उन्होंने जो कुछ किया वह सही था ? प्रश्न चाहे कुछ भी हो ! किन्तु, सत्य यही था की उनके वियोग का समय निश्चित हो चुका था । उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय गंगा का बिछोह सहना होगा ।
    नियति ने प्रेम उत्पन्न किया , वचन दिलवाया एवं पुनः वचन को तुडवाया और अब यह वियोग ! नियति अपने कार्य सिद्ध करके ही मानती है और मनुष्य मात्र नियति के हाथों का खिलौना बनकर रह जाता है। गंगा ने अपने पग विशुद्ध कल - कल प्रवाहित होती अपूर्व जलराशि की ओर बढा दिए । जल की सतह पर शिशु को अंक में लिए गंगा आगे बढती गयी । नदी के मध्य में जाकर धीरे - धीरे जल में प्रवेश करती हुई विलुप्त हो गयी ।
    शांतनु देर तक प्रवाहित होती गंगा की अपूर्व जलराशि को निहारते रहे । नदी के जल को हाथों में भरकर अपने चेहरे पर डाला । हाँ ! यही तो है मेरी गंगे का स्पर्श ! सूर्य क्षितिज की ओर बढ़ने लगा । क्लांत एवं हारे - से शांतनु अपने अश्व पर बैठ कर वापस लौट चले ।
    क्रमशः .......
    लेखक - राजू रंजन   .

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