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    महाभारत खंड -1 युद्ध के बीज - 3

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    वसंत !
    हाँ ! वसंत ही तो आया था राजा शांतनु के जीवन में !
    जीवन में बारहों - मास वसन्त छाया हो जैसे ! शांतनु की दुनिया बस रानी तक ही सिमट गयी थी जैसे । बह गए कर्त्तव्य , कर्म , नीति , अनीति -  प्रेम की धारा में !
    किन्तु , शाश्वत तो कुछ भी नहीं होता इस संसार में ।
    दिन है तो रात है । प्रकाश है तो अन्धकार है । पुण्य है तो पाप भी है । और हाँ ! सुख है तो दुःख भी अवश्यम्भावी है । जब सुख का परिमाण इतना अधिक हो तो दुःख कम क्यों हो ! शांतनु शायद जीवन के इस सत्य को भूल - से गए थे । किन्तु , प्रकृति कुछ भी नहीं भूलती । जब जीवन के हर क्षण में सुख अपने चरम पर होता है तो न जाने किस मार्ग से दुःख दबे पाँव चला आता है और हमें पता भी नहीं चलता ।
    राजा शांतनु को पुत्र - रत्न प्राप्त हुआ । संपूर्ण राज्य में प्रसन्नता की लहर दौड़ पड़ी । नगर में उत्सव मनाया गया । किन्तु , विधि का विधान कुछ और ही था ।
    ब्रह्ममुहूर्त की बेला में पायल की सुमधुर ध्वनि से शांतनु की आँखे खुलीं । उन्होंने सामने देखा । उनकी भार्या नवजात शिशु को हाथों में उठाये द्वार की ओर जा रही थी ।
    शांतनु ने हल्के स्वर में पुकारा -
    " प्रिये ! कहाँ जा रही हो ? "
    किन्तु , उन्हें कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला । वह तीव्र क़दमों से आगे बढ़ती गयी । राजा को यह दृश्य कुछ सहज नहीं जान पड़ा । वह उठकर पीछे-पीछे चल पड़े । महारानी तीव्र गति से महल के प्रांगण से बाहर निकल गयी । राजा ने भी पगों का वेग बढ़ाया । किन्तु , रानी के वेग से तादात्म्य नहीं हो पा रहा था । वह उनसे थोड़े पीछे रह जा रहे थे । उन्होंने एक बार पुनः पुकारने का प्रयास किया । किन्तु , रानी पर इस पुकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।
    शांतनु लगभग दौड़ते हुए पीछे - पीछे चल रहे थे ।
    ब्रह्ममुहूर्त के हल्के अन्धकार के मध्य सूने मार्ग पर तीव्र गति से आगे बढ़ते हुए रानी ने नगर की सीमा को पार कर लिया । तत्पश्चात वन के मध्य से गुजरते हुए वो आगे बढ़ती गयी । वन को पार कर वो नदी के तट पर पहुँची । राजा शांतनु भी दौड़ते हुए उनके पीछे नदी तक पहुंचे । उन्हें किसी अनिष्ट की आशंका हो रही थी । वह रानी से कुछ ही दूर थे कि एक अद्भुत दृश्य से उनकी आँखे फटी रह गयीं । रानी गंगा नदी की लहरों पर ऐसे चल रही थीं मानों भूमि पर चल रही हो । शांतनु के आँखों के सामने से वह नदी के जल पर गमन करती हुई नदी के ठीक मध्य में पहुँच गयी । इससे पहले कि शांतनु कुछ समझ पाते रानी ने नवजात शिशु को गंगा की लहरों में प्रवाहित करते हुए कहा -
    " पुत्र ! तुम प्रसन्न हो ! "
    यह दृश्य देखकर राजा जड़ हो गए । उनके वंश को आगे बढ़ानेवाला , उनके शरीर एवं आत्मा का अंश गंगा की धारा में विलीन हो चुका था ।
    किंकर्तव्यविमूढ़ राजा के समक्ष रानी प्रकट हुई । उसके मुखमंडल पर शोक का कोई चिह्न नहीं था । वह मुस्कुराते हुए बोली -
    " राजन् ! मुझसे कोई भी प्रश्न नहीं करना । विवाह - पूर्व दिए अपने वचन का स्मरण करें ! "
    इतना कहकर वह वापस लौट चली ।
    कितनी विषैली थी यह मुस्कान !
    राजा शांतनु को गहरा आघात पहुँचा । क्षण भर में भविष्य की समस्त सुन्दर कल्पनायें स्वप्न की भाँति विलुप्त हो गयीं । संतान पाकर पुनः संतानविहीन होना ! उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था ।
    एक माँ ऐसा कैसे कर सकती है ?
    स्वयं के अंश से उत्पन्न हुए संतान की हत्या कोई कैसे कर सकता है ? और वो जल की सतह पर चल पाने में सक्षम कैसे थी । वह कोई अप्सरा है या कोई मायावी राक्षसी !
    यह कैसा रहस्य है ?
    न जाने कितने प्रश्न राजा शांतनु के मन - मस्तिष्क को झकझोर रहे थे ।
    अपने ही वचन के पाश में बँधकर कितने विवश हो गए हैं - शांतनु !
    जीवन कितना सरस , कितना सुखमय था ! अचानक यह निर्मम आघात !
    न जाने कितनी देर तक नदी किनारे शांतनु इन्हीं प्रश्नों में उलझे हृदय पर असह्य बोझ लिए बैठे रहे ।
    ऐसी पत्नी से प्रेम करें अथवा घृणा ?
    क्रमशः ..............
    लेखक - राजू रंजन

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