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    महाभारत खंड -1 युद्ध के बीज - 2

    river in woods


    राजा के निराश मन में मानों चेतना का संचार हुआ । तुरंत उठ खड़े हुए एवं उसके निकट जा पहुंचे ।
    " हे देवी ! आप कौन हैं ? "
    उस सुंदरी के अधरों पर वही मोहक मुस्कान तैर उठी -
    " राजन् ! मैं प्रश्न का विषय नहीं । मैं तो सिर्फ उत्तर हूँ । "
    उस सुंदरी के शब्दों में रहस्य था । शांतनु थोड़े परेशान हो उठे ।
    " मैं कुछ समझा नहीं । आप कौन हैं ? "
    " मैं कौन हूँ ? इस प्रश्न का उत्तर आपके परिचय में छुपा है । अगर आप अपना परिचय दे पाए तो आपको मेरा परिचय जानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जायेगी । "
    " मेरा परिचय ! मुझे कौन नहीं जानता ! मैं शांतनु हूँ । "
    " शांतनु ! यह परिचय तो मात्र इस संसार के लिए है । यह आपका वास्तविक परिचय नहीं है । जिस क्षण आप मुझे अपना वास्तविक परिचय दे सकेंगे , उसी क्षण आपको मेरा परिचय मिल जाएगा । परंतु , जहाँ तक मुझे प्रतीत हो रहा है की मात्र मेरा परिचय जानने के लिए इस समय तक आप यहाँ प्रतीक्षा नहीं कर रहे ।"
    " किन्तु , आपको अपना परिचय देने में क्या कष्ट है ? इतना रहस्य क्यों ? "
    " महाराज ! समय अत्यंत मूल्यवान है । जिस कारण आप अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को तत्पर थे उसका निवारण मेरे परिचय से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है । आप अत्यंत व्यग्र दिख रहे हैं । प्रतिदिन आपका इस नदी के तट पर आगमन मात्र मेरा परिचय जानने के लिए तो नहीं हो सकता । आपके मुखमंडल पर जो पीड़ा दिख रही है उसका निवारण करना अधिक उचित होगा । "
    उस सुंदरी के शब्दों से शांतनु के मन में थोडा भय उत्पन्न हुआ । कहीं उनके बार - बार परिचय देने के आग्रह से खिन्न होकर वह पुनः विलुप्त न हो जाए । राजा ने अपने मन की पीड़ा को प्रकट किया -
    " हे देवी ! मुझे आपसे प्रेम हो चुका है ! इस प्रेम ने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी है कि किसी भी कार्य में मेरा चित्त नहीं लगता । हर क्षण आपकी ही मोहक छवि मेरे नेत्रो के समक्ष रहती है । कृपया मेरा परिणय - निवेदन स्वीकार करें । "
    उस सुंदरी को पुनः न देख पाने के भय से राजा शांतनु ने सबकुछ एक साँस में कह डाला । असंयत शांतनु इतना कहकर शांत हो गए । मानो उनके हृदय से अत्यंत भारी बोझ उतर गया हो ।
    उस सुंदरी ने तुरंत उत्तर नहीं दिया ।  सामने प्रवाहित होती नदी के जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था । शांतनु के परिणय - निवेदन को सुनकर उसने अपनी पलकें झुका ली । लज्जा से नत नयन ऊपर उठने को तैयार न थे । कुछ क्षणों तक दोनों के मध्य मौन छाया रहा । फिर कुछ विचारते हुए उस सुंदरी ने कहा -
    " आपके प्रेम को पाकर मैं धन्य हुई । किन्तु, राजन् ! मुझसे विवाह करने से पहले तनिक विचार कर लें । कहीं आप भूल तो नहीं कर रहे । क्योंकि विवाह से पूर्व आपको मुझे कुछ वचन देने होंगे । "
    वचन की बात सुनकर शांतनु थोड़े चौंके । किन्तु, उनके सामने और कोई मार्ग शेष न था । किसी वचन के मूल्य पर भी अगर इस प्रणय - दग्ध हृदय को शान्ति मिले तो यह मूल्य अत्यंत अल्प था । मरणासन्न व्यक्ति को क्या स्वीकार और क्या अस्वीकार ! विरह की अग्नि में प्रेमी हर क्षण भस्मीभूत होता है । फिर ऐसे प्रेमी के लिए किसी वचन की अस्वीकृति का तो कोई प्रश्न ही नहीं था । राजा ने उत्तर दिया -
    " मैं आपको वचन देने के लिए तैयार हूँ । आप सिर्फ अपनी इच्छा प्रकट करें ।"
    उस सुंदरी ने अपनी दृष्टि को शांतनु के मुख पर स्थिर किया । अधरों की मुस्कान का स्थान गंभीरता ने ले लिया । उसने अत्यंत कठोर शब्दों में कहा -
    " तो फिर सुनिए ! हे राजन् ! सर्वप्रथम यह कि आप मुझसे मेरा परिचय कभी नहीं पूछेंगे । मैं विवाह के उपरान्त चाहे जो भी कार्य करूँ , आप मुझे रोकेंगे नहीं । न ही आप मुझसे कोई कठोर बात कहेंगे । अगर आप इस वचन को तोड़ेंगे तो मैं उसी क्षण आपको छोड़कर चली जाऊँगी । "
    इतना कहकर उस सुंदरी ने मौन धारण कर लिया एवं शांतनु के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी । शांतनु का चित्त विचलित हो उठा । ये वचन पूर्ण स्वछंदता की मांग कर रहे थे । उचित हो या अनुचित - हर परिस्थिति में पूर्ण स्वछंदता । किन्तु , वचन को अस्वीकार करने का एक ही अर्थ था - प्रेम का त्याग !
    व्यग्र से शांतनु ने उस सुंदरी की ओर दृष्टि डाली , पुनः सामने प्रवाहित होती नदी में चंद्रमा के प्रतिबिम्ब को देखा । सहसा तीव्र वायु का एक झोंका उठा एवं नदी के वक्षस्थल पर लहरें दोलायमान हो उठीं । चंद्रमा का प्रतिबिम्ब तिरोहित हो उठा । शांतनु का हृदय आसन्न अनिष्ट की परिकल्पना से काँप उठा । तत्क्षण उन्होंने अपने हाथ उस सुंदरी की ओर बढ़ाते हुए कह डाला -
    " मुझे संपूर्ण वचन स्वीकार हैं । "
    उस सुंदरी ने अपने हाथों को बढ़ाकर शांतनु के हाथों को थाम लिया ।
    मंद शीतल प्रवाहित होता समीर रातरानी के पुष्पों की सुगंध से भर उठा । समय को मानों पंख लग गए । चन्द्रमा तीव्र गति से आकाश से उतरने लगा ।
    *   *    *    *      *
    प्रातःकाल का सूर्य आज कुछ अधिक ही उज्ज्वल था ।
    राजा ने रथ में उस सुन्दर स्त्री के साथ नगर में प्रवेश किया । पूरे नगर में यह सूचना फैल गयी । स्त्री अज्ञातकुलशीला थी ।  किन्तु, अनुपम सौंदर्य से युक्त थी । राजा शांतनु ने विवाह के लिए उपयुक्त मुहूर्त निकलवाया ।
    अज्ञात कुल की स्त्री से विवाह की चर्चा संपूर्ण नगर में थी । किन्तु, राजा के आदेश के प्रतिकूल जाने का साहस किसी में नही था ।
    नियत समय पर शांतनु ने उस स्त्री का पाणिग्रहण किया ।  हस्तिनापुर को महारानी प्राप्त हुई ।
    क्रमशः ............
    लेखक- राजू रंजन

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