Header Ads

  • नवीनतम

    Recent Posts:

    काला धन

    black money


    उस गठरी में रखे थे उसने संभाल के
    पाँच सौ के चार नोट ।
    वो नोट जिसमें शेष थी नयेपन की महक अभी भी
    गठरी की गंध भी जिसे मिटा नहीं सकी थी ।
    सुना किसी से ये नोट नहीं चलेंगे अब
    पूरे बरस लोगों का वजन बता - बताकर
    सिक्कों को नोटों में , फिर नोटों को पाँच सौ के नोट में ,
    बदलने की कथा बड़ी लंबी है ।
    फिर सुना , बदल सकते हैं इसे भी !
    जान में जान आई !
    पर, किसी ने बताया कि प्रूफ चाहिए
    प्रूफ पहचान का !
    फिर से वो निराश हो उठा !
    जिसकी कोई पहचान ही नहीं
    वो प्रूफ कहाँ से लाये अपनी पहचान का ?
    सड़क पर सोनेवाले की क्या होती है पहचान ?
    गर्मी की लू और ठण्ड की सिहरन ने भी कभी नहीं पूछा
    प्रूफ पहचान का ।
    बिना किसी भेदभाव के बारिश ने भिंगोया तन भर उसे
    पर, नहीं पूछा कभी
    प्रूफ पहचान का !
    तो क्या बेकार हो जायेंगे उसके ये नोट ?
    नहीं ! किसी ने कहा - बदल दूंगा तेरे भी नोट
    क्योंकि कई प्रूफ हैं मेरी पहचान के !
    बस ये चार नोट तीन हो जायेंगे !
    बड़ा महँगा था सौदा !
    पर , तीन तो मिलेंगे वरना कुछ भी नहीं बचेगा ।
    तो फिर कर डाला उसने भी सफ़ेद अपना काला धन !
    बिना किसी पहचान के ।
    फिर से बँध गयी गठरी तीन नोटों के साथ ।
    कवि - राजू रंजन

    पढ़ें : कहानी : सच 
    पढ़ें : कविता : याद
    पढ़ें : महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज - 10  

    1 comment:

    Post Top Ad

    Post Bottom Ad