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    महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज - 12

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    कमल की सुगंध नासिका से होते हुए मानों शांतनु के अंतस तक उतर गयी हो । शयनकक्ष में करवटें बदलते शांतनु नौका - विहार के एक - एक क्षण को मानों पुनर्जीवित करते रहे ।
    और दूर यमुना के तट के किनारे स्थित उस कुटिया के एक कोने में एक छोटा सा दीपक अभी भी जल रहा था । पहली बार सत्यवती ने किसी राजा को इतनी निकटता से देखा था । हस्तिनापुर के राजा उसकी नौका में बैठे रहे और उसे तनिक भान भी नहीं हुआ कि वह राजा हैं ।
    कितने सरल और विनम्र हैं - राजा शांतनु !
    सत्यवती अपने विचारों में खोयी रही ।
    कितनी कथाएं सुन चुकी है सत्यवती शांतनु के बारे में । सुना था राजा शांतनु को देवी गंगा से अपार प्रेम था । किन्तु , गंगा ने उनके सात पुत्रों को जलसमाधि दे दी । और आठवें पुत्र की प्राप्ति हुई तो पत्नी ने उन्हें त्याग दिया ।
    इतने सरल एवं विनम्र हैं तभी तो किसी ने उनके सात पुत्रों को उनसे छीन लिया । सत्यवती के नेत्रों की चमक धीरे - धीरे बढ़ रही थी ।
    क्या ऐसे भी होते हैं क्षत्रिय !
    क्षत्रिय !
    पुनः इस शब्द ने सामने आते ही उसके मस्तिष्क को मथना शुरू कर दिया ।
    पिताश्री तो बाल्य - काल से ही कहते आ रहे हैं कि उसके शरीर में भी किसी क्षत्रिय का रक्त है । एक अप्सरा जो कि शापग्रस्त होकर मत्स्य के रूप में परिणत हुई थी वही तो उसकी माता थी । पिता कहते हैं उस मत्स्य के उदर से एक पुत्र एवं एक पुत्री की प्राप्ति हुई थी जिसे लेकर वह उसी राजा के पास गए थे । राजा ने पुत्र को तो स्वीकार कर लिया किन्तु पुत्री को वापस कर दिया ।
    वही तिरस्कृत पुत्री ही तो है सत्यवती !
    उसे तिरस्कृत किया गया क्योंकि वह कन्या थी । या फिर इसलिए कि उसके श्यामवर्णी शरीर से मत्स्य की दुर्गन्ध आती थी । शायद उन्हें भय होगा कि इस सांवली मत्स्यगंधा का पाणिग्रहण कोई भी राजकुल नहीं करेगा ।
    तिरस्कृत सत्यवती !
    सत्यवती का रोम - रोम मानों घृणा एवं प्रतिशोध के ताप से दहकने लगा । नहीं ! यह तिरस्कृत सत्यवती ही एक दिन इन क्षत्रियों के भविष्य का निर्धारण करेगी ।
    अपने प्रारब्ध को बदलना जानती है सत्यवती !
    स्वयं को मत्स्यगंधा से पंकजगंधा में परिणत कर सकती है । निश्चय ही एक दिन वह राजसत्ता का निर्धारण भी करेगी ।
    शांतनु !
    सत्यवती के मुख पर एक हल्की मुस्कान तैर उठी ।
    " कितने सरल एवं विनम्र हैं शांतनु ! "
    उस कक्ष में एकाकी बैठी सत्यवती के मुख से ये शब्द निकले । और सत्यवती हँस पड़ी ।
    उस हँसी में विष था ! धीमा विष ! जिसकी दाहकता धीरे - धीरे वायु में घुलकर उस रात्रि के अन्धकार को और भी भयावह बनाने लगी ।
    * * * * * * * *
    जब आखेटक के अंदर आखेट की तीव्र इच्छा होती है तो मृग काफी दूर से भी न जाने किस सम्मोहन से खिंचा चला आता है । और फिर उस तीव्र इच्छा के वशीभूत होकर स्वयं अपनी मृत्यु के मुख में समा जाता है ।
    शांतनु नियत समय पर पुनः यमुना के तट पर पहुँचे । सत्यवती तट पर नौका लगाये मानों उनकी ही प्रतीक्षा में बैठी थी । शांतनु ने निकट जाकर कहा -
    " आज पुनः नौका - विहार की अभिलाषा है । "
    सत्यवती खड़ी हो गयी एवं हाथ जोड़कर अभिवादन किया ।
    " हस्तिनापुर के महाराज का स्वागत है ! "
    शांतनु को यह संबोधन कुछ असहज - सा लगा ।
    " देवी ! मैं राजा शांतनु हूँ यह आप जान चुकी हैं । किन्तु , न जाने क्यों राजाओं को दिया जानेवाला यह सम्मान आज मुझे चुभ रहा है । "
    " इसमें चुभने जैसी तो कोई बात नहीं महाराज ! आप राजा है तो यथोचित सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है । "
    " कभी - कभी सम्मान बोझ से लगते हैं एवं मनुष्य के हृदय की सहजता को नष्ट कर देते हैं । कल आपकी नौका में विहार करनेवाले व्यक्ति को बिना किसी सम्मान के जो सुख प्राप्त हुआ था उसके आगे इस सम्मान में कोई सुख नहीं । "
    " जब आप सामान्य व्यक्ति थे तो आपको सहजता मिली । किन्तु , जब सामने हस्तिनापुर के महाराज हों तो मेरे जैसी निर्धन दासराज की पुत्री सहज कैसे हो ? "
    इन शब्दों ने शांतनु के मन पर गहरा आघात किया । किन्तु , शांतनु ने यह प्रकट नहीं होने दिया ।
    " देवी ! इस वाद - विवाद में मात्र समय ही नष्ट होगा । उचित होगा कि इस नौका को यमुना की धारा में खुला छोड़ दिया जाए । नौका अपना मार्ग स्वयं ही ढूंढ लेगी । "
    शांतनु के मुख पर हल्की मुस्कान थी ।
    सत्यवती ने लज्जा से सिर झुका लिया एवं पतवार चलाने लगी ।
    यमुना के स्वच्छ जल में कभी - कभी सत्यवती की छाया दिखती एवं कहीं से आती कोई धारा फिर उसे तिरोहित कर देती । राजा शांतनु अपलक दृष्टि से सत्यवती को ही देख रहे थे । मानों उसके कुछ कहने की प्रतीक्षा कर रहे हों । किन्तु , आज मानों सत्यवती के मुख में कोई शब्द ही न था ।
    शांतनु ने उस मौन को भंग किया -
    " स्त्री होकर भी एकाकी नौका चलाने में आपको भय नहीं लगता ? वह भी अपरिचित यात्रियों के साथ ? "
    सत्यवती ने अपनी दृष्टि जल से हटाकर शांतनु की ओर की -
    " प्रथम तो मैं इतनी रूपवती नहीं एवं द्वितीय यह कि महाराज शांतनु के राज्य में इस प्रकार के भय की कोई आवश्यकता नहीं । निरीह से निरीह प्राणी भी आपके राज्य में स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है । "
    शांतनु ने अपनी प्रशंसा के अंश को छोड़कर प्रथम अंश का सूत्र पकड़ा ।
    " कौन कहता है आप रूपवती नहीं ? आपका रूप तो किसी के भी चित्त को हर सकता है । "
    " महाराज ! अपराध क्षम्य हो ! किन्तु , यह प्रशंसा सत्य नहीं । मैं श्याम वर्ण की कन्या हूँ । आप न जाने किस दृष्टि से मुझे रूपवती कह रहे हैं । "
    सत्यवती ने अपनी प्रशंसा का खंडन तो किया किन्तु , उसका तृषित हृदय उन प्रशंसापूर्ण शब्दों की और विस्तृत व्याख्या चाहता था ।
    " कौन कहता है श्याम वर्ण में सौंदर्य नहीं होता ? श्याम वर्ण तो स्वयं में ही संपूर्ण वर्णों को समाहित करता है । जिसमें सबकुछ समाहित हो उससे सुन्दर तो कुछ हो ही नहीं सकता । "
    " राजन ! अपराध क्षम्य हो ! किन्तु , मुझे प्रतीत होता है कि आप मेरे रूप का उपहास कर रहे हैं । "
    सत्यवती के मुख पर थोड़ी गंभीरता छा गयी ।
    " क्षमा चाहता हूँ देवी ! किन्तु , यह उपहास नहीं । "
    शांतनु थोडा आगे बढ़कर सत्यवती के निकट ही बैठ गए ।
    " यह उपहास नहीं । मेरा निवेदन है ! प्रणय - निवेदन ! "
    शांतनु ने अपनी दृष्टि सत्यवती के नेत्रों पर स्थिर कर दी । सत्यवती के लिए यह अप्रत्याशित तो नहीं था । किन्तु , उसने स्वयं पर संयम रखा । अपनी दृष्टि नीचे कर ली एवं नौका के एक कोने में सिकुड़ - सी गयी ।
    " उत्तर दो प्रिये ! क्या मेरा प्रणय - निवेदन स्वीकार है ? "
    सत्यवती ने अपने हृदय को कठोर किया ।
    " प्रणय राजपरिवारों के लिए कौतुक - मात्र होता होगा किन्तु , हमारे लिए प्रणय अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है । हम प्रणय को मात्र प्रणय तक नहीं रखते इसे परिणय में परिवर्तित करने को श्रेयस्कर मानते हैं । मेरे लिए ऐसे प्रणय का कोई मूल्य नहीं । जिससे मेरा विवाह होगा वही मेरे प्रणय का वास्तविक अधिकारी होगा । "
    सत्यवती के शब्दों को सुनकर जैसे शांतनु नींद से जागे हों । उनका मन कल्पनालोक के आकाश से वास्तविकता के कठोर धरातल पर गिरा । सत्यवती ने गहरा आघात किया था -
    प्रणय राजपरिवारों के लिए कौतुक - मात्र होता होगा !
    सत्य था ! प्रणय के भावावेग में उन्होंने इस पर विचार ही नहीं किया था कि इसके आगे की परिणति विवाह ही तो थी । वह पूर्व - विवाहित हैं एवं एक युवा पुत्र के पिता भी । शांतनु का उत्साह ठंडा पड गया । वह मौन हो गए । सत्यवती ने भी आगे कुछ नहीं कहा । काफी समय तक नौका यूँ ही यमुना की लहरों पर तैरती रही । फिर सत्यवती ने ही उस मौन को भंग किया ।
    " पिताश्री के आने का समय हो रहा है । अगर आपकी आज्ञा हो तो नौका को तट पर लगाऊँ । "
    " हाँ ! चलो ! आज इतना विहार ही यथेष्ट है । "
    प्रस्थान करते समय पूर्व की भाँति ही शांतनु ने एक मुक्ता - माला सत्यवती के अंक में डाल दिया एवं बिना कुछ कहे वहां से चल पड़े ।
    राजा के पग क्लांत थे एवं मन बोझिल !
    और कोई अभी भी आखेट पर दृष्टि लगाये मुस्कुरा रहा था !
    क्रमशः ...................
    लेखक - राजू रंजन


    1 comment:

    1. दीवाली की अपर्तिम भेट| कृपया ऐसे ही लिखते रहे |

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